Monday, April 12, 2010

तुम्हारा साथ ...

डर लगता है एहसासों की उस नमी से...
उम्मीदों के रंगीन पर अधूरे से आसमा ...
और बिखरे ख्वाबों की रेतीली जमीन से।
क्या महसूस किया तुमने.... की
पल दो पल के साथ में कैसे चाँद निकल आया
और अब स्याह अमावस की रात घिर आई ।
पर इस रात में रजनीगंधा की महक है ,
दूर आ थे गए हम सपनों की उस जमीं से ,
ख्यालों की दुनिया और स्पर्श की उस नमी से ,
और आज ......
आज फिर डर सा लगा जब ,
तुम्हारे हांथों में जब नमी देखी ,
आँखों में उम्मीदों की नयी सी जमीं देखी .

2 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  2. आज फिर डर सा लगा जब ,

    तुम्हारे हांथों में जब नमी देखी ,

    आँखों में उम्मीदों की नयी सी जमीं देखी .


    अंतिम पंक्तियाँ दिल को छू गयीं.... बहुत सुंदर कविता....

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