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Wednesday, April 14, 2010

तुम्हारी ही छाँव में....

अरसे बाद मुस्कुराया तुम्हारी छांव में,
जिन्दगी के बेहद करीब आया ,
कुछ पल साथ रहा जो  तुम्हारे तो
अतीत से मेरा बचपन लौट आया,
वजह मिली मेरे वजूद को तलाशने की  ,
जब कंधे पर तुम्हारा हाथ  नज़र  आया. 
एक मौन जो हावी था ,
परत दर परत इस आवाज़ पर,
एक स्मित बन अधरों पर उतर आया,
तुम्हारी ही छांव में.

तुम्हे शायद  पता भी नहीं पर 
तुम्हारे स्नेह के बितान तले,
एक शख्स यहाँ हैरान नज़र आया, 
एक फूल खिलने को है तुम्हारी छांव  में,
 चहक कर मिलने को है जिन्दगी से  .....
...... तुम्हारी ही छाँव में.